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Book Code: 1111016936209

Jagram Singh

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Untitled Document

पुस्तक के बारे में

जब बालक मां की गोद से उतरकर धरती मां की गोदी में पैर रखता अथार्त सान्निध्य पाता है तो वह अपने नवनयनों से वृहद् संसार का अनुभव करता है। जिस प्रकार सूर्य क्षितिज के वक्ष को चीरकर प्रथम झलक में प्रखर तीक्ष्ण प्रभाव के साथ अवनि पर तेज रूप में अवतरित होता है, उसी प्रकार भाव भी प्रारम्भिक दिनों की भांति उत्सुक, उत्कंठायुक्त, अतिउत्साही, उमंगयुक्त एवं सानंदयुक्त कदम सीधी तीक्ष्ण धार बनकर प्रकट होता है तब कहीं जाकर सर्वंकष सामाजिक ताने- बाने को नूतन आलोक से आलोकित एवं सुखद गौरव से गौरवान्वित कर सार्वत्रिक बसंत की नूतन छवि का अवलोकन करा कर सर्वत्र आनन्द की अनुभूति कराता है। काव्यांजलि किरण में इन्हीं सबका जैसे उतुंग शिखर से अवनि तल आने वाली प्रखर किरण के प्रणय निवेदन को शब्द रूप में रचित करने का प्रयत्न उसी प्रकार किया है जिस प्रकार धमनियों में तीव्र दौड़ने वाले रक्त के प्रवाह के समान जो धर्म हेतु समर्पित कार्यों द्वारा मानव मात्र की सात्विक मनोवृत्ति को दिशाबोध कराता है।

लेखक का परिचय

जीवन परिचय
नामः जगराम सिंह
माता का नामः स्व. श्रीमती गोमती देवी
पिता का नामः स्व. श्री इन्दल सिंह
शिक्षाः स्नातकोत्तर - अंग्रेजी
अध्यापनः 1989 से 1994 तक हायर सेकेण्डरी स्कूल में अंग्रेजी विषय का अध्यापन
कार्यक्षेत्राः 1994 से अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक
साहित्य सेवाः
मूल अभिरूचिः अंग्रेजी भाषा में पद्य लेखन (सौ से ऊपर काव्य संग्रहद्ध)
अंग्रेजी व्याकरण में: (1) New Flow of Spoken English
(2) New Flow of General English
हिन्दी भाषा में पद्य साहित्यः

(1) काव्यांज्जलि-भोर (2) काव्यांज्जलि-उदय (3) काव्यांज्जलि-किरण (4) काव्यांज्जलि-प्रभात

हिन्दी भाषा में गद्य साहित्यः
(1) भारत दर्शन (2) माँ (3) सामाजिक क्रांति के शिल्पी (4) समरसता के भगीरथ
(5) उत्सव हमारे प्राण (6) राष्ट्र के गौरव (7) हमारी प्रार्थना

विषय-सूची

1. भारतवन्दना.... 1
2. देश की पुकार... 2
3. आराधना... 5
4. अभिलाषा... 8
5. बलिदान... 9
6. पुकार... 11
7. कृतज्ञता... 13
8. सपूत... 14
9. संकल्प... 16
10. रावी के उस पार... 19
11. जागरण की बेला... 20
12. जीवन का निर्माण... 22
13. भारत देश नहीं होता तो... 23
14. सनातन राष्ट्र की जय हो 24
15. आत्महवन की बलिवेदी पर... 25
16. गुरू गोविन्द सिंह का औरंगजेब को पत्र... 27
17. मिर्जा राजा जयसिंह को छत्रपति शिवाजी का पत्र... 30
18. महाराणा फतेहसिंह को केसरी सिंह बारहठ का पत्र... 34
19. सीता को बस राम चाहिए... 37
20. भारत टुकड़ा नहीं भूमि का... 38
21. सोने की चिड़िया... 39
22. सैनिक वीर महान... 41
23. तापहारिणी तुलसी... 45
24. चंदन धूल भारत की... 47
25. गर्वोन्नत धवल हिमगिरि... 49
26. धर्मयुद्ध आरम्भ करो... 52
27. अब श्वांस न और प्रतीक्षा को ... 56
28. समर की मेदिनी... 58
29. धो पाता यदि राजनीति के.... 58
30. पृथ्वी हो साम्राज्य नेह का... 59
31. शोणित कभी-कभी पीती है... 59
32. सबसे बड़ा धर्म है नर का... 60
33. हृदय सागर मथित होकर... 60
34. कंचन को नर साध्य नहीं ... 61
35. सांझ हुई उड़ चले विहग सब... 62
36. जिसका मन ऊँचा होगा... 63
37. एक चिंगारी कहीं जागी... 64
38. जब तक है नर के नयनों में... 65
39. संभ्रम के झंझावातों में ... 66
40. बुद्धि शासिका थी जीवन की... 67
41. अपने वीर चरित पर तो मैं... 68
42. जब तक भारती स्वतंत्रन होगी... 69
43. युद्ध ही अब शेष आशा... 70
44. रवि का आगम नही... 71
45. कायरों की बात कर 72
46. विनय की नीति कायर की 73
47. जमा पायी सत्ता के उर पर 74
48. प्रतिहिंसा का दीप भयानक 75
49. दिनकर का साम्राज्य तभी तक 76
50. जब तक मां का मान सुरक्षित 77
51. पूज्य मां के अपमान का बदला चुकाऊँगा 78
52. जिस दिन समर की अग्नि 79
53. नर्क उनके लिए जो पाप को स्वीकारते हैं 80
54. कोई नहीं मिटा सकता है 81
55. भारत ही सारी वसुधा को 82
56. चलता पथिक सदा गर्व से 83
57. पग बढ़ाते ही सभी कुछ छीन लूंगा 84
58. जब तक स्वयं खड़े होंगे न 85
59. सर्वनाश का नहीं यज्ञ हो आत्मसात का 86
60. शत्रु अब जीवित न जायेगा यहां से 87
61. पर हाय यहां भी धधक रहा अंबर है 88
62. पुरुष विक्रमी कौन? दूसरा 89
63. आनन सरल वचन मधुमय है 90
64. भाग्य सूर्य उदित ही रहता 91
65. काल चक्र को वही बदलता 92
66. क्षात्र तेज और ब्रह्म तेज का 93
67. क्यों कह रहे हो युद्ध करने को जनार्दन 94
68. यदि परशु फिर से उठा 95
69. युद्ध को पहचानते सब लोग हैं 96
70. चल दिये क्यों छोड़ मग में 97
71. जीवन का संदेश यही 98
72. श्वास रहते शत्रु प्रवेश असंभव 99
73. प्रतिशोध की आग को अब कैसे? बुझाऊँ 100
74. वह लोक जहां शोणित का ताप नहीं 101
75. पाषाण भी जब प्रकट होगा नरसिंह बनकर 102
76. कोटिक यज्ञों का प्रतिफल 103
77. स्वर्ग का आनंद हारा 104
78. सुमनों सी छवि 105
79. जाने कैसे दिन कट जाता 106
80. और न कोई चाह शेष अब 107
81. अब तो भटके को 108
82. अंततः वैशाली मिल ही गई 109
83. अब सपने सब पूर्ण हो गये 110
84. शेष न किंचित जीने की इच्छा 111
85. गंगा स्वयं द्वार आ गई 112
86. अब तो मुक्ति पा सकूँगा 113
87. नव उपहार के सहारे 114
88. अब तो पासन शेष रखूँगा 115
89. जीवन की सर्वस्व भेंट 116
90. हर श्वास में समा गये हैं 117
91. इन्हें कैसे दे सकूँगा 118
92. मांग लो सर्वस्व अपितु 119
93. इनके बिना तो एक पल 120
94. दबी हुई चिनगारी 121
95. इनके बदले में सब 122
96. कलंक न लगने पाये 123
97. निश्चित हो आरम्भ 124
98. काल से भी न डरूंगा 125
99. ये खंडहर स्वयं ही 126
100. पुनर्ग्रहण न लगने दूंगा 127
101. निर्दोषी को सिंहासन 128
102. पर नारी को भी 129
103. समय मूल्य जो न 130
104. रवि के सन्मुख दीपक के 131
105. सजल वसंत के मधु झोंके से 132
106. दो छोरों का मिलन 133
107. सहसा घिर आई बदली 134
108. अहंकार का शीश झुक गया 135
109. काल जिसने बांधा 136
110. भोर चाह अधूरी रह गयी 137
111. सब बना बनाया खेल क्षण में 139
112. भाग्य में मरना लिखा है 140
113. असमय दिनकर डूब गया 141
114. वचन पालन सच्ची पूजा 142
115. कल तक कंचन का सिंहासन 143
116. सिंहा सन के बदले 144
117. भाग्य से अधिक 145
118. यदि हृदय हो शुद्ध 146
119. यदि हो अटल विश्वास 147
120. शीश पर हो आत्मीयता का हस्त 148
121. वंचितों को कण्ठ हार 149
122. जीवन यज्ञ के प्रतिफल के लिए 150
123. सबको खिलाकर 152
124. जीवन के कंटक प्रमाण में 153
125. सबके लिए सुधा की 155
126. परिजनों को मोक्ष 156


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Last updated: 17-Jul-2019   Designed by IndiaPRIDE.com