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Book Code: 1111015987054

डॉ॰ अक्षयबर सिंह (Dr. Akshyaber Singh)

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पुस्तक के बारे में


अध्यात्म, जीवन जीने की एक कला है जो हमें सुख व शान्ति की राह से मनुष्यत्व के विकास पर ले जाता है।लेखक एक कृषि वैज्ञानिक रहा है।जीवन यात्रा में, गृहस्थ सन्त यशपाल जी महाराज (भाई साहब जी) का सानिध्य रहा।आप आध्यात्म साधना करते हुए ‘राजयोग’का व्यवहारिक रुपान्तर ‘आनन्दयोग’के रूप में कर रहे थे।साधना की मूलबात थी, दुनियावी काम (स्वधर्म) करते हुए दिनचर्या का खाली समय परमात्मा की याद में लगाने की, जिससे आज के काम और अच्छे हों तथा साथ-साथ इंसान जीवन मुक्त अवस्था की ओर अग्रसर हो। इसके लिए दिन के 24 घन्टे ध्यान की अवस्था में रहने की पद्धति विकसित की। इस पुस्तक में लेखक के स्वयं, गृहस्थ साधकों के अनुभव व महात्मा जी के कथानामृत का संकलन है, जो हर इंसान के लिए ग्राह्य होगा, ऐसा लेखक मानता है।

लेखक का परिचय

डा॰ अक्षयबरसिंह का जन्म ग्राम व पोष्ट, बभनगवाँ, जिला सुलतानपुर (उ॰प्र॰) वर्ष 1943 में एक आध्यात्मिक परिवेश के कृषक परिवार में हुआ। शिक्षा स्थानीय ग्रामीण स्कूल, सरैया मझौवा से प्रारम्भ हो सुलतानपुर, इलाहाबाद, आई॰आई॰टी॰खड़गपुर व विधान चन्द कृषि विश्व विद्यालय कल्यानी (पश्चिम बंगाल) से हुई। डा॰सिंह, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के रिसर्च संस्थानों (Central Soil and Water Conservation, Research and Training Institute, Dehradun, ICAR Research Complex for North Eastern Region, Shillong and Indian Agricultural Research Institute New Delhi) में वैज्ञानिक के पद पर रहते हुए वर्ष 2003 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के ‘जल तकनीकी केन्द्र’से प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। कार्यकाल के दौरान आपको चार राष्ट्रीय स्तर के अवार्ड एवम् नार्थ ईष्ट में किये गये कार्य (प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन) पर, लाइफ टाइम एचीवमेन्ट एवार्डस मिले। आपका संपर्क, 1979 में गृहस्थ सूफी सन्त महात्मा यशपाल जी (भाई साहब) महाराज से हुआ और तब से इस विषय में अनुभव आधारित, व्यवहारिक आध्यात्मिक ज्ञान का संकलन व वैज्ञानिक विश्लेषण करते रहे। सूफी सिलसिले के संतो का मानना रहा है कि मानव समस्या का मूल कारण है, जीवन में राम नाम (ध्यान/चितकी एकाग्रता) की कमी हो जाना। डा॰ सिंह की इस बात में पूर्ण आस्था बनी, जो आपके संकलनों में दिखती है। यह आपकी आध्यात्मिक जागृति श्रंखला की 7 वीं पुस्तक है। इसके पहले 1986 में आपने महात्मा यशपाल जी के प्रवचनों का संकलन किया जो ‘‘अखिल भारतीय संत मत सतसंग की साधन पद्धति’’ के नाम से प्रकाशित हुई। अध्यात्म ज्ञान के व्यवहारिक पक्ष से संबन्धित विभिन्न प्रकार के आपके लेख भी प्रकाशित हो चुके हैं। आप महात्मा यशपाल जी द्वारा प्रतिपादित आनन्द योग के साधक रहे हैं जिसमें गृहस्थ में रहते हुए, दुनिया के काम धर्मानुकूल करते हुए दिन के 24 घन्टे ध्यान में रहने की साधना का प्रावधान है। आनन्द योग साधन पद्धति में कबीर दर्शन की छाप दिखती है, जो एक सरल व व्यवहारिक रूप में अपनाई गई है व विकसित हो रही है।


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Last updated: 17-Jun-2019   Designed by IndiaPRIDE.com